बीजेपी के जश्न में आईपीएफटी का ‘अड़ंगा’

त्रिपुरा में मिली अप्रत्याशित जीत का जश्न मना रही बीजेपी को अभी 24 घंटे  ही हुए थे कि पार्टी की मुश्किलें शुरू हो गई हैं. प्रदेश में उसकी सहयोगी पार्टी इंडीजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) ने आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग की है.

रिपोर्टों के अनुसार जहां बीजेपी अपने प्रदेश अध्यक्ष बिप्लब कुमार देब राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनाने की योजना बना रही थी वहीं सहयोगी पार्टी आईपीएफटी आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग उठा कर परेशानी खड़ी कर दी हैं.

दरअसल रविवार को आईपीएफटी नेताओं ने अगरतला प्रेस क्लब  एक बैठक की जिसकी जानकारी बीजेपी को नहीं दी गई थी. बैठक में आईपीएफटी के अध्यक्ष एनसी देबबर्मा ने किसी आदिवासी नेता को राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनाने की मांग की.

उन्होंने कहा, ‘आदिवासी मतदाताओं के समर्थन के बिना बीजेपी-आईपीएएफटी गठबंधन को इतने बड़े पैमाने पर राज्य विधानसभा चुनाव में जीत नहीं मिल सकती थी. हम अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों के चलते चुनाव जीते हैं , इसलिए आदिवासी मतदाताओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट से जीते हुए किसी उम्मीदवार को ही सदन का नेता चुना जाना चाहिए और जो सदन का नेता होगा वही अगले मुख्यमंत्री के तौर पर भी शपथ लेगा.’

बिप्लब कुमार देब के बारे में जब उनसे पूछा गया तो देबबर्मा ने कोई जवाब नहीं दिया. हालांकि बीजेपी के प्रदेश प्रभारी सुनील देवधर का कहना है, ‘हमने इस प्रेस कांफ्रेंस को नहीं सुना है. उन्होंने अपनी राय दी होगी. आईपीएफटी के नेताओं से हमारी मुलाकात सोमवार को होगी, उस दौरान सभी मसलों पर बातचीत की जाएगी.’

दूसरी ओर माकपा और कांग्रेस नेताओं का कहना है कि वे आईपीएफटी की इस मांग पर हैरान नहीं है. कांग्रेस उपाध्यक्ष तापस दे ने कहा, ‘चुनाव प्रचार  के दौरान बीजेपी और आईपीएफटी ने जो भी कहा वो विरोधाभासी था. पूरे चुनाव के दौरान आईपीएफटी यह कहती रही कि वे अलग राज्य के लिए चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं बीजेपी का कहना था कि वे आईपीएफटी की इस मांग का समर्थन नहीं करते. यह एक अस्थिर गठबंधन होगा.’

माकपा सांसद और आदिवासी नेता जितेंद्र चौधरी का कहना है कि ये गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चलेगा. उन्होंने कहा, ‘यही होता है जब आप शॉर्ट-टर्म चुनावी फायदे के लिए एक अलगाववादी राजनीतिक दल से गठबंधन करते हैं. आईपीएफटी अपने इस रवैये पर टिका है इसका कारण है कि उन्हें इस बारे में पीएमओ से आश्वासन मिला है. त्रिपुरा में कभी अलग राज्य नहीं बन सकता. आदिवासी युवाओं को यह पता लग जाएगा कि इनके वादे कितने खोखले हैं.’

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